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मकर संक्रांति क्यों मनाया जाता है?


Pandit4Pooja
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अधिकतर लोग मकर संक्रांति को बस तिल-गुड़, पतंग और दान का त्योहार समझते हैं।लेकिन इसके पीछे एक ऐसा सच छुपा है… जो किताबों में नहीं, परंपराओं की आत्मा में है।मकर संक्रांति दरअसल कोई “त्योहार” नहीं है।ये वो दिन है जब सूर्य पहली बार नियम नहीं तोड़ता।हाँ, सुनने में अजीब लगेगा…पर सच यही है।साल भर सूर्य अपनी चाल बदलता रहता है,लेकिन मकर संक्रांति के दिनवो दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर लौटता है।यानी — अंधकार से प्रकाश की यात्रा।अब ध्यान दो…हमारे शास्त्रों में कहा गया है किउत्तरायण मृत्यु को नहीं, मुक्ति को आसान बनाता है।इसीलिए भीष्म पितामह नेअपनी मृत्यु के लिए यही समय चुना था।एक और बात, जो शायद ही कोई बताता है —मकर संक्रांति चंद्र कैलेंडर से नहीं,सूर्य के वास्तविक खगोलीय स्थान से तय होती है।इसलिए ही ये लगभग हर साल14 जनवरी को ही आती है।जब दुनिया ज्यादातर त्योहारभावनाओं पर मनाती है,तब सनातन धर्मगणित और खगोलशास्त्र पर पर्व मनाता है।अब तिल और गुड़ की बात…लोग कहते हैं “मीठा खाओ, मीठा बोलो”लेकिन असली कारण इससे कहीं गहरा है।इस समय शरीर मेंवात दोष सबसे ज्यादा बढ़ता है,तिल उसे…तिल उसे शांत करता हैऔर गुड़ शरीर को ऊर्जा और ऊष्मा देता है।यानी तिल-गुड़ कोई रस्म नहीं,ये आयुर्वेदिक संतुलन है,जो हमारे पूर्वजों ने बिना लैब के समझ लिया था।अब दान की परंपरा समझो—मकर संक्रांति परकंबल, तिल, घी, अन्न और वस्त्र का दानसिर्फ पुण्य कमाने के लिए नहीं होता।ये वो समय है जबप्रकृति खुद कहती है—“जो तुम्हारे पास है, उसे बाँटो,क्योंकि अब दिन बड़े होंगे,ऊर्जा बढ़ेगी, जीवन आगे बढ़ेगा।”एक और छुपा हुआ संकेत…इस दिन नदियों में स्नान कोबहुत पवित्र माना गया है।क्यों?क्योंकि सूर्य जब उत्तरायण होता है,तो उसकी किरणेंजल के भीतर तक जाती हैं।आज के विज्ञान की भाषा में कहें तोये विटामिन-D का प्राकृतिक रीचार्ज है।लेकिन तब इसे“सूर्य स्नान” कहा जाता था।पतंगों को भी यूँ ही मत देखो।छत पर खड़े होकरआकाश की ओर पतंग उड़ानादरअसल प्रतीक है—मन को ऊँचा उठाने का,सोच को विस्तार देने का।और सबसे गहरी बात…मकर संक्रांति हमें याद दिलाती है किप्रकृति कभी अंधकार में अटकी नहीं रहती।सूर्य भी अगरछह महीने दक्षिण की ओर जा सकता है,तो वापस उत्तर की ओर भी लौटता है।यानी जीवन में चाहेकितना भीअंधेरा क्यों न हो—उत्तरायण निश्चित है।इसीलिए मकर संक्रांतिसिर्फ त्योहार नहीं…ये एक घोषणा है—कि सनातन धर्मभावनाओं से नहीं,ब्रह्मांड की चाल से जुड़ा हुआ है।अब अगली बार जब तिल-गुड़ खाओ,पतंग उड़ाओ या दान करो—तो बस इतना याद रखना…तुम एक रस्म नहीं निभा रहे,तुम सूर्य के साथ चल रहे हो।

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